“आदमी की औकात” – दिवंगत जैन मुनि तरुण सागर जी द्वारा रचित कविता

फिर घमंड कैसाघी का एक लोटा,लकड़ियों का ढेर,कुछ मिनटों में राख…..बस इतनी-सी हैआदमी की औकात !!!! एक बूढ़ा बाप शाम को मर गया,अपनी सारी ज़िन्दगी,परिवार

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अंतर्द्वंद

अपने अंदर के द्वंद कोअंतर्द्वंद्व लिखती हूंकई सवाल अपने आप से पूछ करकटहरे में खुद को खड़ा करती हूंकई देखे सुने युद्ध ,महायुद्धमहाभारत युद्ध, प्रथम

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नारी का सम्मान

नारी का सम्मान करो, नारी है ममता की मूर्ति।नारी का सत्कार करो, नारी है करुणा की कीर्त।।नारी कोई कमज़ोर नहीं, कोमल और कठोर सही।नारी है

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उम्मीद नए साल की….

साल आता है साल जाता हैअपनी यादें छोड़ जाता है।खुशी के पल से ज्यादा टीसछोड़ गया है साल बीस।। देश ही नहीं पूरे विश्व मेंइस

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एक गुज़ारिश

हम हारते कैसे नहींजहाँ जज बनकर वक़्त बैठा होऔर वकील बनकर नसीब,वहाँ हार तो निश्चित थी ।जानते हो ना !ऐसी अदालत में नियतिबड़े-बड़े हथकण्डे अपनाती

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देश का सौरभ रहो तुम, देश का गौरव बनो तुम

देश का सौरभ रहो तुम, देश का गौरव बनो तुम,आधुनिक तकनीक थामे, देश के प्रहरी बनो तुम .देश का सौरभ रहो तुम………….. अपना निहत्था वीर

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