ऐ इंसान….. खुद को पहचान

ऐ इंसान…..! माना सच के लिए न लड़ना तेरी आदत है…पर झूठ का साथ देना तेरी फ़ितरत तो नहीं ? माना कोशिशों से घबराना तेरी

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मेरा एक सपना है….

मेरा एक सपना है…. मैं अपने पापा जैसी बन जाऊँ जैसे वो सबकी पसंद-नापसंद का..ध्यान रख लेते हैं |वैसे ही मैं अपनी इच्छा दबाकर…सबका मन

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मैं एक किरदार अनेक

मैं हूं एक और किरदार अनेक निभाती हूं टूटे हुए फेवरेट खिलौनों को जोड़कर बिना डिग्री की इंजीनियर बन जाती हूं मैं हूं एक और

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एक मैं और एक तुम……

एहसासों की डोर से बंधे हैं दोनों।इनसे जुदा तू भी नहीं, जुदा मैं भी नहीं।। महफिलों में मिलते हैं सबसे मुस्कुराकर।सबको पता हैं खुश तू

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