कुछ देर ठहर जा ऐ जिंदगी…

कुछ देर ठहर जा ऐ जिंदगी..इस खुदगर्ज़ दुनिया में मुझे भी मतलबी बन जाने दे। अब तक चली हूँ अपने उसूलों पर.. ज़रा इस दुनिया

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बूढ़ा….. बचपन

क्या कहता है बूढ़ा मन..जैसे लौट रहा बचपन। पास उनके जाओ,बैठो दो पल ।तुम अपना आज सुनाओ,वो सुनाए बीता कल।। माना धुंधली हो गई है

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ऐ इंसान….. खुद को पहचान

ऐ इंसान…..! माना सच के लिए न लड़ना तेरी आदत है…पर झूठ का साथ देना तेरी फ़ितरत तो नहीं ? माना कोशिशों से घबराना तेरी

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मेरा एक सपना है….

मेरा एक सपना है…. मैं अपने पापा जैसी बन जाऊँ जैसे वो सबकी पसंद-नापसंद का..ध्यान रख लेते हैं |वैसे ही मैं अपनी इच्छा दबाकर…सबका मन

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थक गई हूँ …. पर हारी नहीं हूँ मैं….

जमानें के तानों से..बेबुनियाद इल्ज़ामों से..बीते हुए अफ़सानो से..थक गई हूँ ….पर हारी नहीं हूँ मैं.. बेवज़ह नफ़रतों से …मतलबी जरूरतों से..एक तरफ़ा समझोतों से…थक

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मैं एक किरदार अनेक

मैं हूं एक और किरदार अनेक निभाती हूं टूटे हुए फेवरेट खिलौनों को जोड़कर बिना डिग्री की इंजीनियर बन जाती हूं मैं हूं एक और

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एक मैं और एक तुम……

एहसासों की डोर से बंधे हैं दोनों।इनसे जुदा तू भी नहीं, जुदा मैं भी नहीं।। महफिलों में मिलते हैं सबसे मुस्कुराकर।सबको पता हैं खुश तू

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