हमारा बचपन

हमारा बचपन

वो बचपन भी क्या बचपन था ,
जब न था कल का ठिकाना ।
एक जगह बस रुक चलते जाना,
आज है यहाँ खेलना ,
आज है यहाँ जाना ,
बस इसी का होता था ,
चार दोस्तों में फ़साना।।
जब हम जाते स्कूल थे,
आते ही भूलते थे।
कल जाना है हमें पहनकर,
यही कपड़ो का आशियाना।।
माँ का खाना ,पापा का प्यार ,
देता था सुकून बार बार ।
सोचती थी हों जाऊँ बड़ी एक बार
सम्भालूगी अपनी ज़िम्मेदारी का भार ,
बस सोचते सोचते यह सो जाना ,
सुबह् उठते ही अपनी नई दुनिया में जाना ।।।
वो बचपन भी क्या बचपन था ,
जब न था कल का ठिकाना ।।

Written By Sonal Basant Nigam

Published as received by Participant Author

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