स्वतंत्रता

स्वतंत्रता

  • मन में स्वराज की चाह थी ,
  • हाथ में आग की मशाल थी ,
  • रगों में जिनके दौड़ता था मातृभूमि के लिए लहू
  • उनके मन में स्वतंत्रता की आस थी ।
  • कई हुए शहीद , तो कई हुए कुर्बान
  • मातृभूमि की रक्षा के लिए ये दिल करे पुकार ,
  • ये जंग थी अपनी माटी के सम्मान की
  • गौरव की , बलिदान की ।
  • मन में न था कोई भी गम ,
  • क्योंकि देह मांग रहा था स्वाधीनता के लिए संघर्ष ।
  • हम आज स्वतंत्र हैं, आज़ाद है, प्रजासत्ताक है,
  • चलों, मिलझुलकर लेते है एक संकल्प,
  • एक नई आशा की किरण के संग ,
  • मैं दूंगा हर विपदा में अपने देश का साथ,
  • जरूरत पड़ने पर दूंगा अपने प्राण का भी बलिदान।
  • ये मेरा अटल वचन है, समाज के लिए एक संकल्प है,
  • मेरे मन में एक नए परिवर्तन का भवर है।

Written By Jigar Dineshbhai Chavda

Published as received by Participant Author

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