मन के हारे हार है.. मन के जीते जीत..

मन के हारे हार है.. मन के जीते जीत..

मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ॥

एक बार एक चिड़िया अपने बच्चों के साथ समुन्द्र के किनारे दाना चुग रही थी, तभी अचानक तेज लहरें आयी और चिड़िया के बच्चों को अपने साथ ले गईं . चिड़िया समुन्द्र के आगे बहुत गिड़गिड़ाई ..”हे ! समुन्द्र मेरे बच्चें वापिस दे….पर समुन्द्र ने एक नहीं सुनी ।

आखिरकार चिड़िया ने निश्चय किया की वह बूँद – बूँद निकाल कर समुन्द्र को ख़ाली कर देगी और अपने बच्चें वापिस ले लेगी, और उसने समुन्द्र में से चोंच से पानी निकालना शुरू कर दिया ।

कुछ देर बाद वहाँ एक तोता आया उसने पूछा -” बहिन ये क्या कर रही है ..?

चिड़िया बोली समुन्द्र मेरे बच्चें खा गया है , अब मैं उसे सुखा कर रहूँगी ।

यह सुन तोता बोला – “अरे नादान ! तेरे से क्या समुंदर सूखेगा ? तू छोटी सी…. और समुन्द्र इतना विशाल। तेरा पूरा जीवन लग जायेगा फिर भी समुन्द्र को फर्क नही पड़ेगा “!

चिड़िया बोली – ” सलाह नहीं ..साथ दे ” यह सुन तोता भी साथ लग लिया।

ऐसे हज़ारों पक्षी आते गए और एक – दूसरे को कहते गए..
सलाह नहीं… साथ चाहिए।

जैसे जैसे पक्षी आते गए समुन्द्र का गुरूर और बढ़ता गया , पक्षिओं का मज़ाक उड़ाते हुए बोला – चाहे पूरी पक्षी जाति को ले आओ …मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे ।


जब यह बात पक्षिओं के राजा गरूड़ के पास पहुंची, उन्होंने भी पक्षिओं का साथ देने की सोची।

गरूड़, विष्णु जी का वाहन है ,जब वह पक्षिओं की सहायता के लिए जाने लगे तो भगवान् विष्णु बोलें -” अरे! गरूड़ तुम कहाँ जा रहे हो .. ?, समुन्द्र तो वैसे भी तुम पक्षिओं से नहीं सूखने वाला”

गरुड़ जी ने बोला – भगवन ! सलाह नहीं.. साथ चाहिए।

फिर क्या.. ऐसा सुन भगवान विष्णु जी भी समुन्द्र सुखाने आ गये।

भगवन के आते ही समुन्द्र डर गया और उसने पक्षी के बच्चे लौटा दिए ।

आज इस संकट के समय में हमें भी एक दुसरे को सलाह नहीं साथ देना चाहिए..

इसलिए.. सलाह नहीं साथ दें।

जो साथ दे सारा भारत, तो फिर से मुस्कुरायेगा भारत।

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