वो हसीन शाम …

लोग पुछते हैं हम से आप क्या सोचते रहते हो आज कल?
क्या बतायें उनको क्या है इस दिल में हर पल ?
क्या जाने वो जिनके दामन में उस चाँद का नूर तक नहीं,
जिस चाँद को इन हाथों से छूकर आए हम उस पल

उस शाम की नमी आज भी हमारे साँसों में है,
उस झील की सिलवटें आज भी हमारी जिस्मोजां में है,
कैसे बयां करें एक शब्द में उस शाम को
जब कही हर बात आज भी हमारी जुबां पर है

उनका होने में कोई कमी ना रह जाये,
आनेवाली वो हसीं घडी हम से ना रूठ जाये,
यही सोच के जी लेना चाहते है हर पल उनके नाम;
जिन्हें सोच, हर शाम बन जाती है फिर वही हसीन शाम

वैसे तो हमें खुद से भी बात करने की आदत है,
परमिले हैं जब से उनसे एक पल की कहाँ फुर्सत है ?
फुर्सत निकले तो कैसे ?
जब हमारी साँसों को उनकी और सिर्फ उनकी ही जरूरत है

परवाह नहीं गर शाम ढलने से रूक जाये,
परवाह नहीं गर रात आने को मुकर जाये;
उनकी एक झलक भी गर मल जाये,
तो हर साँस खुद ही एक नयी जिंदगी हो जाये

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