एक गुज़ारिश

एक गुज़ारिश

हम हारते कैसे नहीं
जहाँ जज बनकर वक़्त बैठा हो
और वकील बनकर नसीब,
वहाँ हार तो निश्चित थी ।
जानते हो ना !
ऐसी अदालत में नियति
बड़े-बड़े हथकण्डे अपनाती है
फ़िर उस अदालत से
खाली हाथ ही लौटना पड़ता है ।
देखा ना ! कैसे ?
नियति ने दाँव पेंच खेलें
वक़्त ने नसीब का सुना और,
हम एक-दूसरे के दिल पर हो रहे
दस्तक भी ना सुन सके।
बोलो मानते हो ना !
इस बात को,
हम एक ही मंजिल के मुसाफ़िर
पर अलग-अलग रास्तों से पहुँचे वही,
जहाँ #प्रीति मुकम्मल होने को
आवाज़ दे रही ।

पर,सुनो…..
एक गुज़ारिश है मेरी,
मुझे माफ़ कर देना
और दोष मत देना मुझे ।
गर मैं…..
मिलने से इन्कार करूँ तो,
क्योंकि मुझे टूटकर
बिखरना नहीं ।
जानते हो….
ये ज़ुदाई ही तो,
मिलन की आस लिए
मन को सुकून देती है मेरे,
कभी तो मिलना होगा,
अपनें बाबूजी से ।
पर, मिलन ??
नहीं बाबूजी नहीं..
मिलने के बाद बिछड़ना
जब नियती ने पहले से ही
तय कर रखा है तो,
बोलो ना !
तुम्हारी #मधु
कैसे विचलित ना हो ?
वापसी पर तुम्हारे,
सह पाओगे ?
फ़िर से इस अधूरे मिलन को
जिसे जन्मों जन्मान्तर के,
अटूट प्रेम कथा लिखना था
उसे एक बार और,
खोकर कौन सी दास्तान
लिखने कहोगे बाबूजी ।
बस,इतनी सी गुज़ारिश है मेरी..
जिसे पहली और आखिरी समझकर
आत्मसात कर लेना ।
हाँ मिलूँगी ज़रूर..
पर,जब जिंदगी की शाम
ढलने लगेगी और आखिरी नींद
आँखों की दहलीज पर
दस्तक देगी ना !
तब मिलूँगी मैं तुमसे,
तुम्हारे नाम आखिरी गीत लेकर।
जिसके बोल,
कुछ इस तरह से होंगे…..

आखिरी नींद दर हो तुम्हारा..

और काँधे तेरे सर हो_हमारा..

बिदाई की वो अनमोल घड़ी_हो..

दो गज़ ज़मीं नहीं बाँहें तेरी हो..

Written By : Ms. Pritee Madhulika

(Published as received from writer)

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