चाय बना दो से चाय बना दूं का सफर

शादी के अगले दिन जब राधिका उठी तो वो एक नए परिवार में थी …यहाँ प्यार तो था पर माँ जैसा नहीं …यहाँ सब अपने थे पर अपनापन नहीं …यहाँ आशीर्वाद तो था पर पापा के हाथ का स्पर्श नहीं…

यहाँ “मम्मी चाय बना दो”,” मम्मी जी चाय बना दू” में बदल गया …एक मात्रा के फर्क ने ही सब कुछ बदल दिया

राधिका यह ही सोचते सोचते कुछ देर तक स्तब्ध रह गयी और अपने आप से बोली की माँ जब आप खाना खाने के लिए कहती थी तो मैं कितना चिढ जाती थी आज समझी हूँ इस बात को की आप कितना लाड लड़ाती थी …

मेरे पहली बार चाय बनाने पर पापा कम चीनी की चाय भी चुस्की लेकर पी जाते थे “मेरी गुड़िया इतनी बढ़िया चाय बनाती है” पूरे मोहल्ले को बतलाते थे …पर आज जब पापा जी के लिए नाप तोल के चीनी पत्ती डालकर चाय बना रही हूं तब पापा का अपार निस्वार्थ प्यार समझ पा रही हूं …

यही सोचते सोचते कि मेरी दुनिया बदल गई ना जाने कब चाय बन गई …

घर को ससुराल और मायके में बाँट दिया … क्या सिर्फ इसलिए मुझे बड़ा किया ….

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