लक्ष्मी माता

लक्ष्मी माता

लक्ष्मी का अर्थ है- ‘ लक्ष्य तक पहुंचाने वाली देवी ‘| पुराणों में लक्ष्मी जी के दो रूप माने जाते हैं – श्रीरूप और लक्ष्मी रूप | श्रीरूप में वे कमल पर विराजमान हैं और लक्ष्मी रूप में विष्णु जी के साथ हैं | श्रीरूप को महालक्ष्मी भी कहा जाता है इनका वाहन सफ़ेद हाथी है और विष्णु जी की पत्नी देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू है|

श्रीरूप लक्ष्मी को ‘धन की देवी’ कहा जाता है , इनकी उत्पत्ति समुंद्रमंथन के समय हुई थी | उनके हाथ में सोने से भरा कलश है | समुंद्र मंथन में कुल 14 रत्न आदि उत्पन्न हुए थे, जिन्हे देवताओं और असुरों  ने आपस में बाँट लिया था | समुंद्र मंथन में सबसे पहले विष निकला था जिसे शिवजी ने अपने कंठ में धारण कर लिया था जिससे उनका नाम नीलकंठ पड़ा | उसके बाद कामधेनु गाय, उच्चै:श्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष और रम्भा नामक अप्सरा निकले| समुंद्र मंथन में आठवें स्थान पर देवी लक्ष्मी प्रकट हुई | वे स्वेत कमल के आसन पर विराजमान थी तथा उनके हाथ में कमल था| उन्होंने स्वयं ही भगवान विष्णु का वरण कर लिया| नवें स्थान पर मदिरा, फिर चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान् धन्वंतरि और सबसे आखिर में अमृत निकला|

लक्ष्मी रूप यानि विष्णुप्रिया लक्ष्मी ऋषि भृगु की पुत्री थी | इनकी माता का नाम ख्याति था| इनके दो भाई दाता और विधाता थे | इनका जन्म शरद पूर्णिमा को हुआ था | लक्ष्मी जी मन ही मन विष्णु जी को पति के रूप में स्वीकार कर चुकी थी इसलिए अपने स्वयंवर में उन्होंने विष्णु जी को चुना|

लक्ष्मी जी के आठ अवतार माने गए हैं – महालक्ष्मी जो वैकुण्ठ में निवास करती हैं , स्वर्गलक्ष्मी जो स्वर्ग में निवास करती हैं, राधाजी और रुक्मणि जी गोलोक में निवास करती हैं, गृहलक्ष्मी जो घर में निवास करती हैं, शोभा जो हर वस्तु में निवास करती हैं और सीता जी जो पाताल लोक में निवास करती हैं|

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार धन की देवी मां लक्ष्‍मी भी शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र मंथन से उत्‍पन्‍न हुई थीं। इसलिए शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है |लक्ष्मी जी का जल-अभिषेक करने वाले दो गजराजों को परिश्रम और मनोयोग कहते हैं |उनका लक्ष्मी जी के साथ अविच्छिन्न संबंध है। कहा जाता है जहाँ परिश्रम और लगन का मेल होगा, वहाँ वैभव और श्रेय-सहयोग की कमी नहीं रहेगी।

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